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बिहार में शराबबंदी पर सरकार का रुख अडिग

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बिहार में जहरीली शराब से हुई मौतों के बाद शराबबंदी कानून पर सियासत तेज हो गई है। अटकलों के बीच वरिष्ठ मंत्री श्रवण कुमार ने साफ किया है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की लागू की गई कोई भी नीति वापस नहीं होगी।

पटना आलम की खबर।बिहार में जहरीली शराब से हुई मौतों के बाद एक बार फिर शराबबंदी कानून और उसकी प्रभावशीलता को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। इस मुद्दे पर जहां विपक्ष लगातार सरकार को घेर रहा है, वहीं अब सत्ता पक्ष के भीतर से भी सवाल उठने लगे हैं। ऐसे माहौल में यह चर्चा भी जोर पकड़ने लगी है कि अगर आने वाले समय में बिहार की राजनीति में कोई बड़ा बदलाव होता है, तो क्या शराबबंदी कानून की समीक्षा संभव है? इन तमाम अटकलों और राजनीतिक बयानबाजी के बीच राज्य सरकार की ओर से यह साफ संदेश दिया गया है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की लागू की गई नीतियों में पीछे हटने का कोई सवाल नहीं है।

राज्य सरकार के वरिष्ठ मंत्री श्रवण कुमार ने इस पूरे विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि बिहार में जो भी नीतियां लागू की गई हैं, वे किसी तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सामाजिक सुधार और प्रशासनिक दृष्टि से बनाई गई हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा लागू की गई कोई भी बड़ी नीति वापस नहीं ली जाएगी। उनके मुताबिक, बिहार में जो शासन मॉडल पिछले वर्षों में विकसित हुआ है, उसने विकास, सामाजिक अनुशासन और कानून-व्यवस्था—तीनों स्तरों पर असर दिखाया है, इसलिए उसे पलटने की बात बेमानी है।

श्रवण कुमार ने इस दौरान यह भी संकेत दिया कि बिहार की वर्तमान नीतियों को लेकर जो चर्चाएं चल रही हैं, वे अधिकतर राजनीतिक अटकलों और विरोधी बयानबाजी का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी गंभीर नीति को कुछ घटनाओं के आधार पर असफल घोषित करना सही दृष्टिकोण नहीं है। उनका तर्क था कि सरकार का काम नीति बनाना, उसे लागू करना और समय-समय पर उसके क्रियान्वयन को मजबूत करना है—न कि हर दबाव में आकर उसे बदल देना। यही कारण है कि शराबबंदी को लेकर सरकार का रुख अब भी अडिग और स्पष्ट दिखाई दे रहा है।

हालांकि, यह पूरा विवाद ऐसे समय सामने आया है जब राज्य के अलग-अलग हिस्सों में जहरीली शराब से मौतों की घटनाओं ने फिर से कानून के असर और उसके जमीनी क्रियान्वयन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष का कहना है कि यदि शराबबंदी पूरी तरह प्रभावी होती, तो अवैध शराब का नेटवर्क इतनी मजबूती से सक्रिय नहीं होता। दूसरी ओर, सरकार का पक्ष यह है कि कानून का अस्तित्व और उसके खिलाफ होने वाली अवैध गतिविधियां—दोनों अलग बातें हैं, और किसी भी अपराध की मौजूदगी भर से कानून को गलत नहीं ठहराया जा सकता।

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वरिष्ठ मंत्री ने हालिया घटनाओं के बावजूद शराबबंदी कानून को सफल बताते हुए कहा कि कुछ छिटपुट घटनाएं जरूर होती हैं, लेकिन इससे कानून के मूल उद्देश्य या उसकी व्यापक सामाजिक उपयोगिता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि सरकार ऐसे मामलों को हल्के में नहीं ले रही है और जहां भी जहरीली शराब, अवैध कारोबार या नेटवर्क का मामला सामने आता है, वहां सख्त कार्रवाई की जाती है। उनका कहना था कि सरकार की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि ऐसे मामलों में शामिल किसी भी व्यक्ति को बख्शा न जाए।

अपने पक्ष को और स्पष्ट करते हुए उन्होंने एक तुलनात्मक तर्क भी दिया। उनका कहना था कि हत्या, चोरी और अन्य अपराधों के खिलाफ भी कानून मौजूद हैं, लेकिन इसके बावजूद अपराध पूरी तरह समाप्त नहीं हुए। इसका अर्थ यह नहीं है कि कानून बेकार हो गया। इसी तरह शराबबंदी कानून को भी केवल इस आधार पर असफल नहीं कहा जा सकता कि उसके बावजूद कुछ लोग अवैध गतिविधियों में शामिल हैं। उनके मुताबिक, किसी भी कानून की सफलता केवल पुलिस कार्रवाई से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और सामूहिक भागीदारी से भी तय होती है।

यही वजह है कि श्रवण कुमार ने इस पूरे मुद्दे को सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि सरकार अपने स्तर पर लगातार जागरूकता अभियान, प्रचार-प्रसार और निगरानी के जरिए शराबबंदी को प्रभावी बनाने की कोशिश कर रही है, लेकिन समाज की भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है। अगर लोग खुद अवैध शराब के खिलाफ सतर्क रहें, सूचना दें और सामाजिक स्तर पर इसका विरोध करें, तभी इस कानून का वास्तविक उद्देश्य पूरी तरह सफल हो सकता है।

इस मुद्दे पर विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव द्वारा लगाए गए आरोपों पर भी मंत्री ने तीखी प्रतिक्रिया दी। तेजस्वी ने आरोप लगाया था कि बिहार में शराब की “होम डिलीवरी” तक हो रही है और सरकार का कानून केवल कागजों पर सख्ती दिखा रहा है। इस पर श्रवण कुमार ने तंज कसते हुए कहा कि अगर विपक्ष के पास इतनी विस्तृत जानकारी है, तो उसे सार्वजनिक करना चाहिए, ताकि कार्रवाई हो सके। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि अगर किसी को नेटवर्क की इतनी बारीक जानकारी है, तो उसका नाम सीआईडी से भी बड़ा हो जाना चाहिए। इस बयान के जरिए उन्होंने विपक्ष पर सिर्फ आरोप लगाने और ठोस सहयोग न देने का आरोप लगाया।

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दरअसल, बिहार में शराबबंदी कानून शुरू से ही केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक प्रतीक के रूप में भी देखा जाता रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसे महिला सुरक्षा, पारिवारिक स्थिरता और सामाजिक सुधार से जोड़ते हुए लागू किया था। यही वजह है कि आज भी सत्ता पक्ष इसे अपनी नीतिगत पहचान के रूप में प्रस्तुत करता है। इसलिए जहरीली शराब की घटनाओं के बाद जब यह सवाल उठता है कि क्या इस नीति की समीक्षा होनी चाहिए, तो सरकार की ओर से आने वाला जवाब सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।

बिहार की राजनीति में यह भी चर्चा चल रही है कि आने वाले समय में यदि सत्ता समीकरण बदलते हैं या नई राजनीतिक परिस्थितियां बनती हैं, तो क्या शराबबंदी कानून को लेकर कोई नरमी या पुनर्विचार हो सकता है। लेकिन फिलहाल सरकार के ताजा रुख से यह स्पष्ट है कि ऐसा कोई संकेत अभी नहीं दिया जा रहा। बल्कि इसके उलट, सत्ता पक्ष यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि वह इस मुद्दे पर रक्षात्मक नहीं, बल्कि आक्रामक और आत्मविश्वासी है।

हालिया घटनाओं ने यह जरूर साबित किया है कि शराबबंदी कानून के क्रियान्वयन, निगरानी और स्थानीय स्तर की जवाबदेही को लेकर गंभीर चुनौतियां बनी हुई हैं। यही वजह है कि यह बहस अब केवल “कानून रहे या हटे” तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि “कानून को और प्रभावी कैसे बनाया जाए” तक पहुंच गई है। सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह एक तरफ अपनी नीति पर कायम भी रहे और दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर उसके असर को अधिक विश्वसनीय भी साबित करे।

फिलहाल इतना तय है कि जहरीली शराब से हुई मौतों ने बिहार की राजनीति में एक बार फिर शराबबंदी बनाम वास्तविकता की बहस को केंद्र में ला दिया है। विपक्ष इस मुद्दे को सरकार की विफलता के रूप में पेश कर रहा है, जबकि सरकार इसे कानून के खिलाफ चल रही अवैध गतिविधियों का मामला बता रही है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बिहार की राजनीति, नीति और जनभावना—तीनों के केंद्र में बना रह सकता है। सरकार का ताजा संदेश साफ है—शराबबंदी कानून पर पीछे हटने का फिलहाल कोई इरादा नहीं है।

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